Monday, January 22, 2018

मनोज कुमार झा की नई कविताएं


                                                                                                                                                                                                                                Photo @anurag_v




मासूमियत में पराजित

वो निहायत मासूम था
इतना मासूम कि उसे इस कठिन जाड़े में भी गर्म कपड़े नही थे
चप्पल किसी के थे जिसे अब उसके पैरों ने कबूल लिया था
रात के तीन थे और मैं स्टेशन पर चाय पी रहा था
वो अंगीठी में हाथ सेंक रहा था जो चायवाले को बुरा लग रहा था
हम दोनों ठंड में थे ,मेरे पास मफलर था और उसके पास खुले कान
वो इस शहर में नया था,शहर उसके लिए नया नहीं था
वो कई शहर देख चुका था और जान चुका था कि हर शहर के दस्ताने एक से होते हैं
हर शहर उसकी मासूमियत को थोड़ा खुरच देता था
वो भूख में था और भूख की आवाज़ नहीँ होती
खाने की डकार होती है

उसे जब मैं शरीफ लगा तो लगभग कान में बोला
मैं कुछ लड़कियों को जानता हूं जो प्लेटफार्म पर घूम-फिर रही है
आप कहें तो बात करा दूँ
वो अपनी मासूमियत में पराजित था ,मैं अपने शरीफ समझे जाने में सशंक।
*** 


उच्छिष्ट

तुम्हें भी चमक की आदत लग जायेगी
हंसने के भीतर प्रकाश उपहास बनकर जगह बना लेगा
तुम शुरू शुरू में जान भी सकते हो शायद 
फिर भूल जाओगे
चाय पीने की दुकान बदल जाएगी
प्यारे पकोड़ों का स्वाद बदल जायेगा
तुम पकौड़े वाली पर चिल्लाओगे
यह सब होगा
खुद को उदार समझते जाने के बावजूद
यह इस शहर का दस्तूर है
यहां हजारों घूमते हुए फ़्लैश लाइट्स है
यहां बहुत अधिक रौशनी है
और तुम जैसे
कीड़ों में बदल रहे
उच्छिष्ट परिवर्तन के ग्राहक उसके खाद्य।

***
 

दुख में बातचीत

वेश्या मत बनना मेरी प्यारी बेटी
 
गिद्धों के शरीर का स्पर्श बहुत दुख देता है
यह रगड़ देता है कालिख मन की दीवारों पर
वेश्याओं का मजाक भी मत उड़ाना
तेरी मां ने भी कुछ ऐसे दिन भोगे हैं
लोभ त्याग देना, नहीं कहूँगा
दो जून का खाना और साफ जल से नहाना लोभ नहीं है
तुम खूब सोने बाली चिड़िया बनना और खूब आराम करना
मैं अपने पंख तुम्हारे लिए छोड़ जाऊँगा
कविताएं पढ़ती रहना और चांदनी में नहाना
याद रखना जिस सरंगिये के साथ मैं गोरखधाम भागा था
उससे चाँद ने वादा किया था कि तुम मेरे साथ रहो
मैं दिलाऊँगा तुझे रोटी और साफ पानी।
***
अन्यथा

एक किसान के पतन के ब्यौरे जानकर 
तुझे क्या मिलेगा
इससे ज़्यादा तो तुझे बैंगन में लगा 
कीड़ा बता देगा
***

सभ्यता

एक अम्बानी की बीबी
तीन लाख का एक कप
यूज़ एंड थ्रो करती है
यह जायज है
हजारों साल की सभ्यता का यह हासिल है।

एक परीछन जमींदार के खेत में ककड़ी
तोड़ते पकड़ा जाता है
उसके मुंह पर कालिख मल दी जाती है
यह भी हजारों साल की सभ्यता का हासिल है।
***

  (सबद पर मनोज की अन्य कविताएं यहाँ )