Tuesday, December 12, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 5 : सारे रास्ते बीच में होते हैं





पिछले दिनों कुछ ऐसे संयोग बने कि दो कवियों पर बार-बार लिखना-बोलना पड़ा। मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी वर्ष हाल ही में गुज़रा है। जिस तरह के राजनीतिक-सामाजिक हालात बनते जा रहे हैं, मुक्तिबोध लगातार और प्रासंगिक होते जा रहे हैं। इसलिए लिखत-बोलत में मुक्तिबोध के प्रसंग आना स्वाभाविक भी है, ख़ासकर इसलिए भी कि वह मेरे प्रिय कवि हैं और मैं उन लोगों में शामिल हूं, जो उन्हें हिंदी का सबसे बड़ा कवि मानते हैं। दूसरे, कुँवर नारायण, हमारी भाषा के एक और महान कवि, जिनका अभी तीन सप्ताह पहले 90 साल की उम्र में निधन हुआ। दोनों बार-बार अपनी ओर बुलाने वाले, और प्रविष्ट हो जाने के बाद बार-बार चुनौतियाँ देने वाले कवि हैं।
मुक्तिबोध के बारे में, रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘युवा-2’ के तहत, बोलने का अवसर मिला था। मैं मुक्तिबोध को हिंदी कविता पर पड़ने वाली एक विशाल स्पॉटलाइट की तरह देखता हूं। उनसे पहले न उन-सा कोई कवि हुआ, न उनके बाद। एक ऐसा अद्भुत कवि, जिसके पूर्वजों का सही-सही पता हम नहीं बता पाते, जिसके वंशजों का कहीं कोई निशान नहीं खोज पाते। हम भले मुक्तिबोध को एक परंपरा में शामिल करें, उनकी एक परंपरा भी बना दें, जोकि होना-बनना लाज़िमी है, लेकिन वह परंपरा ठीक मुक्तिबोधीय शैली में विकसित नहीं हो पाती। उनके बाद के कुछ कवियों को उनकी परंपरा में खड़ा करने की कोशिश की जाती है, लेकिन साफ़ दिखता है कि वह फाउल प्ले है। उनके जैसा कोई नहीं है। वह अनूठे हैं। वह मध्य बिंदु हैं। पूरी हिंदी कविता को दो भागों में विभाजित करने वाले। उनके पहले की कविता। उनके बाद की कविता।
मुक्तिबोध की जिस बात को सबसे ज़्यादा उद्धृत किया जाता है, वह यह कि हमें अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे। इस पंक्ति की रोशनी में मैं सोचता हूं कि आख़िर ख़ुद मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति का कौन-सा ख़तरा उठाया था? क्या उन्होंने ऐसी कविताएँ लिखी थीं कि उन पर हमले हों? उनका घर जला दिया गया हो? उनके हाथ-पैर तोड़ दिए गए हों? परसाई पर तो इस तरह के हमले हुए थे। और भी कुछ लेखकों पर हुए थे। तो क्या परसाई व बाक़ी अन्य ने अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, जो कि ख़ुद मुक्तिबोध ने नहीं उठाए, जबकि कहते बार-बार थे? क्या अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाना इतना सरलीकृत कृत्य है कि आप पर हमले होने लग जाएँ? आप पर हिंसा होने लगे? किसी को गाली दे दीजिए, खिझा दीजिए, तो एक रोज़ वह अपने दल-बल के साथ आप पर हमले करेगा ही, तो क्या गाली देने व खिझाने को अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाना माना जा सकता है? नहीं मान सकते। मानेंगे, तो वह एकांगी व सरलीकृत बात होगी।
मुक्तिबोध को चाहे जो कह लीजिए, उन्हें एकांगी व सरलीकृत कहना पाप होगा। फिर मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति का कौन-सा ख़तरा उठाया था? उनके इर्द-गिर्द लिखी हिंदी आलोचना में इसका कोई स्पष्ट व कन्विन्सिंग उत्तर नहीं मिलता। मैं मुक्तिबोध की कविता को दो रचनात्मक ध्रुवों के मिश्रण की तरह देखता हूं। और अपने इस सवाल का जवाब पाने की कोशिश करता हूं। और इसके लिए मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं, जो कि फिजिक्स से है। बहुत मशहूर उदाहरण है।
सन् 1704-05 के आसपास एक वैज्ञानिक हुए न्यूटन, जिन्होंने रिसर्च के बाद कहा कि प्रकाश एक कण है। न्यूटन के तर्क व प्रमाण बहुत शक्तिशाली थे, इसलिए उनके युग के विज्ञान ने उनकी बात को मान लिया। “प्रकाश कण है” इस मान्यता को आधार बनाकर विज्ञान अपनी सारी रिसर्च करने लगा और हम जानते हैं कि उस सदी में विज्ञान कहीं नहीं पहुंचा।
क़रीब सौ साल बाद, एक और वैज्ञानिक आया, उसका नाम था टॉमस यंग। उसने भी लंबी रिसर्च की और न्यूटन के सारे तर्कों को ध्वस्त कर दिया। उसने कहा, प्रकाश कण नहीं, तरंग है। उसकी बातें व प्रमाण इतने शक्तिशाली थे कि उसके युग के विज्ञान ने उसकी बात को मान लिया। “प्रकाश तरंग है” इस मान्यता को आधार बनाकर विज्ञान अपनी सारी रिसर्च करने लगा और हम जानते हैं कि उस सदी में भी विज्ञान कहीं नहीं पहुंचा।
सौ साल और बीत गए, एक नया वैज्ञानिक आया, उसका नाम था अल्बर्ट आइंस्टाइन। वह बैंक में क्लर्क था। नौकरी के बाद बचे घंटों में रिसर्च करता था। उसने भी बहुत लंबी रिसर्च की और कहा कि प्रकाश कण भी है और तरंग भी है। प्रकाश दोनों है। उसे दोनों में से कोई एक-भर मान लेना ऐतिहासिक चूक है। उसका व्यवहार दोहरा है। उसे दोनों मानना होगा। आइंस्टाइन ने तब तक की पूरी सोच को ही ध्वस्त कर दिया था। ज़ाहिर-सी बात है कि उनके तर्क, प्रमाण व नतीजे इतने ताक़तवर थे कि समकालीन विज्ञान को उनकी बात माननी ही पड़ी। “प्रकाश कण भी है और तरंग भी है” इस मान्यता को आधार बनाकर विज्ञान अपनी सारी रिसर्च करने लगा और हम जानते हैं कि उसके बाद के बरसों में विज्ञान ने जितनी तरक़्क़ी की, उतनी कभी नहीं की थी। आइंस्टाइन की सोच ही अपने आप में एक चमत्कार है। विज्ञान की भाषा में इसे वेव-पार्टिकल डुएलिटी (कण-तरंग द्वैत) कहा जाता है। और यही द्वैत, प्रकाश के संदर्भ में कण-तरंग के अद्वैत (नॉन-डुएलिटी) को भी प्रतिष्ठित कर देता है। जैसे ही विज्ञान ने इस द्वैत व अद्वैत को समझा, हमारा जीवन बदल गया। विज्ञान ने बड़ी-बड़ी खोजें कीं। जिस कंप्यूटर पर बैठकर मैं यह सब लिख रहा हूं, उसके बनने में आइंस्टाइन की उस सोच की भी भूमिका है। जिस मोबाइल पर आप यह सब पढ़ रहे हैं, उसके बनने में भी उनकी उसी सोच की ही भूमिका है।
यह हुई फिजिक्स की बात। अब बात करेंगे मेटाफिजिक्स की। कविता एक तरह से मेटाफिजिक्स का ही हिस्सा है। मुक्तिबोध की विचारधारा बहुत स्पष्ट थी। वह मार्क्सवादी थे। इस पर किसी को संदेह नहीं। वह संभवत: काफ़्का को नापसंद करते थे और अस्तित्ववाद के प्रति उनमें ख़ास तरह का संकोच व परहेज़ था। पर इतने बरसों में यह भी लगभग ज़ाहिर हो चुका है कि हिंदी में काफ़्का का कोई योग्य बौद्धिक सहोदर हुआ, तो वह स्वयं मुक्तिबोध थे। दोनों के पास दु:स्वप्न का संत्रास है। दु:स्वप्न का संत्रास, बीसवीं सदी के साहित्य में व्याकरण की तरह इस्तेमाल होता है। दु:स्वप्न का संत्रास एक अस्तित्ववादी उपकरण है। जिस लेखक के भीतर दिखेगा, उसे अस्तित्ववादी उपकरण की तरह ही पहचाना जाएगा, मार्क्सवादी उपकरण की तरह नहीं। और यही कारण था कि उनमें अस्तित्ववादी प्रवृत्तियों की खोज कई आलोचकों ने की जिनमें रामविलास शर्मा प्रमुख रहे। नामवर सिंह ने उनके तर्कों को काटा और लगभग बताया कि मुक्तिबोध में अस्तित्ववाद नहीं है। हिंदी में इस पर बहुत बहसें हो चुकी हैं और मेरा मंतव्य उन बहसों में जाना नहीं है, क्योंकि न तो मैं मुक्तिबोध को मार्क्सवादी साबित करना चाहता हूं और न ही अस्तित्ववादी। क्योंकि ये दोनों बातें पर्याप्त सिद्ध हैं। और यदि उनकी कविता पढ़ी जाए, तो स्वयंसिद्ध दिखेंगी। समस्या यहीं है कि या तो उनकी कविताओं को मार्क्सवादी माना जाता है या कुछ लोग उन्हें अस्तित्ववादी मानते हैं। बात घूमकर वहीं पहुंची- प्रकाश को या तो कण माना जा रहा था या तरंग। प्रकाश कण भी है और तरंग भी है, यह बात मानने में समय लगा था। उसी तरह क्या मुक्तिबोध की कविता को दोनों माना जा सकता है? मेरी नज़र में उनकी कविता दोनों है, क्योंकि प्रकाश की ही तरह उनकी कविता दोहरा व्यवहार करती है। उनकी कविता का बुनियादी कंटेंट जिस तरह मार्क्सवादी है, उनकी शैली उसी तरह अस्तित्ववादी है। दु:स्वप्न का संत्रास उनकी शैली है, तो दु:स्वप्न उनका कंटेंट है, वह दु:स्वप्न, जिसमें यथार्थ छिन्न-भिन्न हो रहा है।
मुक्तिबोध अपनी मानसिक व सामाजिक स्थितियों से लगातार असंतुष्ट रहते थे। यह असंतोष उनके पूरे रचनाकर्म में, उनके निबंधों-पत्रों में मुखर रूप से, दिखाई देता है। “मानसिक द्वंद्व उनके (पढ़ें मेरे) व्यक्तित्व में बद्धमूल” रहा। हम जानते हैं कि आरंभिक बरसों में मुक्तिबोध ने छायावादी कविताएँ लिखी थीं। मार्क्सवाद के प्रति उनमें कोई अनुराग न था। 1942 में तारसप्तक के प्रकाशन के समय वह घोषित मार्क्सवादी थे। हालांकि तारसप्तक में दिये अपने वक्तव्य में भी उन्होंने अपने इस असंतोष को सांकेतिक तौर पर ज़ाहिर कर दिया था। उसके बाद उन्होंने 1947 में ख़ुद को प्रयोगवाद से जुड़ा संकेतित किया। फिर जब नई कविता आंदोलन शुरू हुआ, तो मुक्तिबोध ने अपना जुड़ाव उससे संकेतित किया। यानी  (उन्हीं के शब्दों में) “अपनी विकास-स्थिति के प्रति असंतोष” उनमें लगातार रहा। इन सब बातों में कुछ भी नया नहीं, क्योंकि ये सब पहले भी छपी हुई हैं और कई आलोचकों ने उद्धरणों समेत इन्हें लिखा है। वे बातें भी छपी हैं, जिनमें क़रीबी मित्रों के हवाले से यह बताया गया कि बाद के दिनों में वह मार्क्सवाद से भी निराश रहने लगे थे।
कहने का अर्थ यह है कि मानसिक द्वंद्व और असंतोष उनके भीतर लगातार रहे। यह मानसिक द्वंद्व व असंतोष महज़ सामाजिक प्रश्नों के स्तर पर नहीं थे, बल्कि व्यक्ति की भूमिका, समाज व विचारधारा के साथ उसके संबंधों को लेकर भी थे। और उन्हीं के कारण उनके रचनाकर्म में अस्तित्ववादी तत्वों का आगमन होता जाता है, जिसके बीज तो तभी से थे, जब वह बर्गसाँ से प्रभावित हुए थे। दुनिया की महान अस्तित्ववादी रचनाओं का अध्ययन किया जाए, मसलन नीत्शे, कीर्केगार्द, दोस्तोएव्स्की, कामू, काफ़्का, सार्त्र आदि की रचनाओं का, तो व्यक्ति की भूमिका, समाज के साथ उसके संबंधों पर जिस तरह के संशय व सवाल उठाए गए हैं, उनमें से कई मुक्तिबोध की कविताओं में भी मिल जाते हैं। इन सबका अस्तित्ववाद अलग-अलग है। अस्तित्ववाद क्या है, इसका कोई स्पष्ट जवाब देना बहुत मुश्किल है। इसकी एक सर्वमान्य परिभाषा दे पाने में अतीत के कई लेखक-विचारक ख़ुद को असमर्थ बता चुके हैं। अपना पूरा लेखनकर्म अस्तित्ववादी शैली में ही करने वाले सार्त्र से जब इस पदबंध की परिभाषा देने को कहा गया था, तो उन्होंने जो कहा, उसका आशय यह है कि- लगातार नास्तिकता से मनोजगत में होने वाले जो विभिन्न परिणाम हैं, उन्हें भाषा में कहने की कोशिश अस्तित्ववाद है।
आमतौर पर यह मान लिया जाता है, और हिंदी में ऐसा मानने की लंबी परंपरा भी रही है कि, मार्क्सवाद व अस्तित्ववाद एक-दूसरे के विरोधी हैं। ऐसा मानने के कई मोटे कारण भी हैं, मसलन- मार्क्सवाद समाज को प्राथमिक महत्व देता है, जबकि अस्तित्ववाद समाज के भीतर व्यक्ति व उसके मनोजगत को। मार्क्सवाद एक विचारधारा है, दर्शन भी है, किंतु अस्तित्ववाद कोई विचारधारा नहीं है, अंशत: दर्शन ज़रूर है, किंतु पूरी तरह दर्शन भी नहीं है। भाषा की सुविधा के लिए भले इसे दर्शन की कोटि में डाल दिया जाता हो, लेकिन इसे दार्शनिक तेवर या समस्या भी कहा जा सकता है और दर्शन की तरफ़ उठाया गया एक सवाल भी। यदि इसे दार्शनिक समस्या की तरह देखा जाए, तो योगवासिष्ठ में भी यह है, शतपथ ब्राह्मण में भी है और होमर की ओडिसी में भी है। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में लेखकों-विचारकों, ख़ासकर गल्पकारों, ने इसका प्रयोग एक शैली या डिज़ाइन की तरह भी किया है। दोस्तोएव्स्की व काफ़्का, अस्तित्ववादी दर्शन या अस्तित्ववादी विचारधारा के लेखक नहीं, बल्कि अस्तित्ववादी डिज़ाइन या शैली के लेखक हैं।
हिंदी में इसे लेकर एक लंबी राजनीति होती रही है। मार्क्सवादी आलोचक, प्राथमिक तौर पर, साहित्य पर राजनीति को वरीयता देते रहे हैं। वे मानते रहे हैं कि कविता कला के स्तर पर बुरी हो, तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, वह समाज के भीतर पहुंच रही है व मार्क्सवादी राजनीति के साथ खड़ी है, तो वह श्रेष्ठ कविता है। इस सोच से ही पता चल जाता है कि उन्हें कविता की अधिक चिंता कभी नहीं रही। जबकि अस्तित्ववादी डिज़ाइन बिना कला की शर्तों पर खरा उतरे हासिल नहीं की जा सकती। समाज में उसका प्रसार भले कम हो, किंतु उसका कला होना निहायत ज़रूरी है। इसलिए मुक्तिबोध को महज़ मार्क्सवादी या महज़ अस्तित्ववादी साबित करना साहित्यिक नहीं, एक राजनीतिक प्रयास के रूप में ही देखा जाना चाहिए और ये प्रयास मुक्तिबोध की कविता के साथ न्याय नहीं करते। जब कोई आलोचक उन्हें महज़ मार्क्सवादी कवि के रूप में देखना चाहता है, तो उनकी कविता के अस्तित्ववादी गुणों, शैली व डिज़ाइन को नज़रंदाज़ करेगा। उसी तरह अगर कोई उन्हें महज़ अस्तित्ववादी बताना चाहता है, तो वह मुक्तिबोध की कविता में व्याप्त शोषणविहीन, समतामूलक उस समाज के महास्वप्न को नज़रंदाज़ करेगा, जो मार्क्सवाद के कारण उपस्थित होता है और जिसके बारे में मुक्तिबोध अभिधा में भी कह देते हैं। मुक्तिबोध की कविता में दोनों प्रकार के गुण व व्यवहार हैं और हमें उन्हें दोनों तरह से देखना आरंभ करना होगा।
मुक्तिबोध अपने कंटेंट में जिस तरह मार्क्सवादी हैं, उसी तरह अपनी डिज़ाइन में अस्तित्ववादी भी हैं। उनकी कविता प्रकाश की ही तरह दोहरा व्यवहार करती है, क्योंकि वह कण भी हैं, तरंग भी हैं। दोनों माने बिना उनकी कविता को पूरी तरह आत्मसात करना संभव नहीं होगा। और उन्हें दोनों मानना कहीं से ग़लत भी नहीं होगा। हां, कुछ लोगों-समूहों की राजनीति को यह सूट नहीं करेगा, वे इसका विरोध करेंगे, पर उनका बुनियादी काम ही यही है कि जो सचाइयाँ उनकी राजनीति को सूट न करती हों, वे उसका विरोध, दमन, उपेक्षा व उपहास करें। आख़िर वे साहित्य को दोयम मानते हैं, राजनीति को वरीय।
मुक्तिबोध ने भले यह जानते-बूझते किया या अनजाने ही किया, यह नहीं पता, लेकिन उनकी कविता में मार्क्सवाद व अस्तित्ववाद का एक रचनात्मक अद्वैत (शंकर का अद्वैतवाद नहीं) ज़रूर दिखाई पड़ता है। और यही उनके द्वारा उठाया गया अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा ख़तरा है। उनके पहले व बाद में किसी कवि ने यह ख़तरा नहीं उठाया। यह काम अकेले मुक्तिबोध ने किया। वह चाहते, तो अज्ञेय के रास्ते पर चलते, बिना मार्क्सवादी कंटेंट लाये वह अस्तित्ववादी डिज़ाइन व सार-तत्व से काम चला लेते। वह भी प्रचलित था। वह चाहते, तो नागार्जुन या शील के रास्ते पर चलते, बिना अस्तित्ववादी डिज़ाइन का प्रयोग सीधे-सीधे मार्क्सवादी कंटेंट जनता के सामने परोस देते। वह भी प्रचलन में था। किंतु मुक्तिबोध में अपने आप को लेकर जो संशय व असंतोष था, वह उनके द्वारा चुने गए दृष्टिकोणों में व्याप्त था। इसीलिए उन्होंने दो बिल्कुल विपरीत लगने वाले चीज़ों को मिश्रित कर दिया। इस मिश्रण से उन्होंने जो रास्ता निकाला, वह दोनों में से किसी एक ध्रुव पर चलने का नहीं था, बल्कि उनके इस चयन से उनका रचनाकर्म दोनों ध्रुवों के बीच स्थित हो गया। यह अपने रचनाकर्म में बीच का रास्ता पा लेने जैसा है। मुक्तिबोध के भीतर यही मध्य का माहात्म्य है।
पाश की मशहूर पंक्ति है- बीच का रास्ता नहीं होता। उस पंक्ति के संदर्भ बहुत अलग हैं और उसका सीधा अर्थ यह है कि जीवन में आपको एक स्टैंड लेना ही होगा, एक चुनाव करना ही होगा। यह भी सच है। जीवन में कई स्थितियाँ ऐसी आती हैं, जब आपको एक तरफ़ होना ही होता है। लेकिन साहित्य व कला के साथ जुड़ा एक बड़ा सौंदर्य यह भी है कि इसमें कोई भी पंक्ति एबसॉल्यूट नहीं बन पाती। पाश की यह पंक्ति कई संदर्भों में सही हो सकती है, लेकिन हर जगह इसे सही नहीं पाया जा सकता। कला, दर्शन, साहित्य और वृहत् जीवन में कई बार बीच के ही रास्ते चुनने होते हैं। एक विडंबना यह भी है कि सारे रास्ते दरअसल बीच में होते हैं। किनारे का रास्ता भी किनारे नहीं होता, वह किनारे और शेष भाग के बीच में स्थित होता है। रास्तों को देखा जाए, तो उनके बाएँ भी कुछ न कुछ होता है और दाएँ भी कुछ न कुछ। कई बार, रास्ता ही दरअसल किसी खेत या क्षेत्र को दो हिस्सों में बांट देता है। सारे रास्ते दरअसल बीच में ही होते हैं, बीच का कोई रास्ता हो या न हो, यह आपका चयन है। ‘में’ और ‘का’ के प्रयोग से वाक्य के अर्थ में बदलाव हो जाता है। साहित्य में वाक्यों के अर्थ किस क़दर बदल जाते हैं, इसको लेकर कबीर और उनके बेटे से जुड़ी एक किंवदंती याद आती है।
कबीर का एक बेटा था- कमाल। वह भी दोहे लिखता था। अपने पिता से बेहद असंतुष्ट रहा करता। इस क़दर कि उनके दोहों को काटते हुए नए दोहे तैयार करता था और आसपास की जनता में उसके दोहे एक प्रतिपक्ष की तरह प्रचलित हो जाते थे। एक बार कबीर ने एक दोहा कहा, जिसकी एक पंक्ति थी-
कहै कबीर दो नावै चढ़िए। एक बूड़े तो एके रहिए।
थोड़ी ही देर बाद इसका खंडन करते हुए कमाल ने एक दोहा लिखा, जिसकी पंक्ति थी-
कहै कमाल दो नाव न चढ़िए। फटै जाँघ के बूड़ के मरिए।
एक ही स्थिति है, लेकिन दोनों के देखने का तरीक़ा अलग-अलग है। कबीर कह रहे हैं कि जीवन में विकल्प बनाकर रखिए, एक से काम न बने तो दूसरे से आपका काम बन ही जाएगा। यह बिल्कुल व्यावहारिक बात है। कमाल कह रहे हैं कि दो विकल्पों को साथ लेकर मत चलिए, साँसत में पड़ जाएँगे। यह भी व्यावहारिक बात है। लेकिन दोनों बातें अलग-अलग स्थितियों में ही सही हो सकती हैं। दोनों एब्सॉल्यूट नहीं हैं। दोनों मिथ्या नहीं हैं, लेकिन दोनों पूर्ण सत्य भी नहीं हैं। इन पंक्तियों का सही-ग़लत होना स्थिति, दृष्टिकोण व चयन पर निर्भर करता है। इसीलिए कहा जाता है कि श्रेष्ठ साहित्य पूरे जीवन का चित्रण करने की कोशिश नहीं करता, बल्कि वह जीवन से अपने लिए एक हिस्से को चुन लेता है। स्थितियों के हिसाब से दोनों ही पंक्तियों को सही मानना होगा। यह दो के बीच फँसने से ज़्यादा दो के बीच समावेश स्थापित करने जैसी बात है।
मुक्तिबोध यदि दो विपरीत लगने वाली चीज़ों के बीच इस तरह का समावेश कर पाते हैं, तो यह सच में बहुत बड़ी बात है। इसके कारण मुक्तिबोध की प्रतिबद्धता को ख़तरे में पड़ा नहीं मानना चाहिए और ना ही उन्हें किसी भयवश महज़ व्यक्ति के अंतर्मन की भुलभुलैयाओं में फँसा हुआ मानना चाहिए। एक कवि दो साहित्यिक स्थितियों के बीच से अपना रास्ता तैयार कर सकता है। उसे उतनी ही गरिमा के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। यदि बीच का वह रास्ता पाकर उसकी कला कुछ बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करती है, तो उनका स्वागत करना चाहिए और उनकी विवेचना करते समय दोनों ही सरणियों को ध्यान में लेना चाहिए। अंतत: कवि की कविता बचती है। वह श्रेष्ठ बनी है, तो उसकी रसोई में चाहे जो चीज़ें रही हों। यहाँ निकारागुआ के कवि एर्नेस्तो कार्देनाल की याद हो आती है। वह मार्क्सवाद से प्रभावित कवि हैं, लेकिन साथ ही रोमन कैथलिक विचारों में भी उनकी गहरी आस्था है। उनका पूरा रचनाकर्म इन दोनों के बीच एक सामंजस्य बिठाने की कोशिश करता है। यह विश्व-कविता में एक बहुत बड़ा प्रयास था और पूरी गरिमा से इसे समझने की कोशिश की जाती है। जीवन की दो विपरीत अवस्थाओं के बीच सुलह बनाने की कोशिश करना वृहत्तर तौर पर रचनात्मक कर्म है। कुँवर नारायण के शब्दों में, जीवन सुंदर सुलहों का नाम है।
एक तरफ़ हो जाने की ज़िद के बरक्स थोड़ी देर रुककर यह भी सोचने का समय है कि क्या सच में एक तरफ़ हो जाना ही सबसे बड़ा समाधान होता है? दुनिया दो ध्रुवों में बंट रही है, बार-बार बंटती रही है, और हमने देखा है कि दोनों ही ध्रुव विनाश की ओर ले जाना चाहते हैं, तब आप किस तरफ़ होना चाहेंगे? किस तरफ़ खड़े होकर आप विनाश को लाना चाहेंगे? और क्या न बेहतर होगा कि आप न इस तरफ़ जाएँ, न उस तरफ़, बल्कि दोनों तरफ़ होने का विरोध करते हुए यह चुनें कि मुझे इन दोनों ध्रुवों के बीच से एक ऐसा रास्ता निकालना है , जो विनाश की तरफ़ न जाए, मनुष्यता को और प्रवर्तित कर सके। ठीक है, दुनिया ध्रुवों में बंट गई है, और आपको ध्रुवों से प्यार है, आप एक ही तरफ़ होना चाहते हैं, लेकिन यह तो सोचिए कि ध्रुवों पर कोई नहीं रह पाता, सिर्फ़ बर्फ़ रहती है। इंसान  को अपने रहने के लिए दोनों ध्रुवों के बीच की जगह को चुनता पड़ता है, क्योंकि उसी जगह से जीवन का सृजन संभव है। स्टैंड लेना बहुत अच्छी बात है, और वह अलग संदर्भ की बात है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मध्य का महात्म्य कहीं बड़ा है। वीररस से भरे लोगों के लिए यह बहुत आसान होता है कि वह सोच लें, मध्य की स्थिति कायरता की स्थिति है। दरअसल, ये ऐसे कोमल व संवेदनशील मुद्दे हैं कि कोशिश करनी चाहिए, इन पर युद्ध की शब्दावली में बात न हो। कुँवर जी की ही एक बात याद आती है, जो इसे कहीं सुंदर तरह से कहती है- “यह समय मुझे मुख्यतः सही समझौतों का वक़्त लगता है, टकरावों का नहीं समझौता लड़ाई की भाषा का शब्द नहीं है, विचार और विकास की भाषा का शब्द है।”  शुरू में मैंने कुँवर नारायण को याद किया था, तो इसी कारण कि मध्य के महात्म्य को मुखर तौर पर स्वीकार करने वाले वह हिंदी के दुर्लभ कवि हैं। इस मध्य का प्रयोग मुक्तिबोध ने भी किया, किंतु उन्होंने इसे स्वीकार न किया, शायद और जीते, तो ज़रूर करते। कुँवर नारायण ने इस मध्य का प्रयोग किया और इसे सविनय स्वीकार भी किया। मनुष्यता की बात करना ही मध्य का माहात्म्य है, क्योंकि मनुष्यता, पशुता और दैवत्व के मध्य वास करती है।